1947 में आजादी के पश्चात, बटुकेश्वर को रिहाई मिली। लेकिन उन्हें वह दर्जा नहीं मिला जो उनके योगदान के अनुरूप था।
17 जुलाई को उन्हें कोमा में डाल दिया गया और 20 जुलाई 1965 की रात उनका देहांत हो गया।
आजाद भारत में उन्हें नौकरी के लिए दर-दर भटकना पड़ा। कभी सब्जी बेचते, कभी टूरिस्ट गाइड बनकर, वो नहीं थमते थे।
पटना में एक दिन, परमिट के लिए जब उनका आवेदन कमिश्नर के सामने पहुँचा, तो वह सिर्फ इसलिए बताया कि उनके पास स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाणपत्र नहीं है।
इसके बाद उन्होंने अपने परिवारवालों से कहा, "कभी सोचा नहीं था कि वो दिल्ली, जहाँ मैंने बम फेंका था, वहीं मेरी मौत होगी, पर स्ट्रेचर पर पड़ा हुआ।"
कुछ समय बाद, जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को इसका पता लगा तो उन्होंने माफी मांगी थी। 1963 में उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया गया, लेकिन उसके बाद उनकी चुप्प बरकरार रही।
1964 में जीवन के अंतिम दिनों में, बटुकेश्वर दिल्ली के सरकारी अस्पताल में कैंसर के खिलवाड़ से जूझ रहे थे। उन्होंने अपने परिवारवालों से कहा, "मेरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार भगत सिंह की समाधि के पास हो।"
भारत पाकिस्तान सीमा के पास पंजाब के हुसैनीवाला स्थान पर उनकी शव समाधि स्थल पर आज भी अपनी कहानी कह रही है।
"किस तरह एक क्रांतिकारी को जो फांसी से बच गया, वो आज भी अस्पताल में पड़ा हुआ है और कोई पूछने वाला नहीं है।"
आज भी हमें उनकी यात्रा को सलामी देनी चाहिए, और हमें सोचना चाहिए, कि कैसे उनकी साहित्य और संघर्षों से भरी जिन्दगी एक बेहद महत्वपूर्ण पाठ सबके लिए हो सकती है।
"महान आत्माओं को शत-शत नमन। 🙏"
(Note: This is an original creation based on the informations available on internet. Any resemblance to real events or individuals is purely coincidental.)
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