मुल्ला नसरुद्दीन एक स्कूल में मास्टर थे। एक दिन, एक मां अपने बेटे को लेकर आई और कहा कि उसे डराने और धमकाने की कोशिश करें, क्योंकि वह बिलकुल बिगड़ा हुआ है। मगर नसरुद्दीन ने इसे सुना नहीं, और उसकी सलाह नहीं मानी। उसने अनुशासन के सभी मार्गों को छोड़ दिया था और उसके बजाय उसने बच्चे को मनोरंजन किया। मुझे डराने की तकनीक में उसने ऐसा कुछ किया कि बच्चा और औरत दोनों ही बेहोश हो गए। इसके बाद, वह भी बच्चे के पीछे भागने लगे, जिससे औरत और बच्चा और भी ज्यादा डर गए। बाद में जब सब होश में आए, तो नसरुद्दीन ने उन्हें समझाया कि भय का खेल किसी का भला नहीं करता। जब हम दूसरों को डराते हैं तो हम खुद भी डरते हैं, और जब हम बुराई से डराते हैं तो हम खुद भी उसी डर का शिकार हो जाते हैं। भय किसी का पक्षपात नहीं करता, यह सबको एक समान रूप में प्रभावित करता है। इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है कि जीवन का शास्त्र बहुत नाजुक है और हमें भय को सही तरीके से समझना चाहिए। भय से दूसरों को डराने की जगह, हमें उन्हें समझने और सहायता करने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि यह हमारे खुद के भय को भी कम कर सकता है।
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